आज तुमसे न मिल पाना
तुम्हारे होने को परिभाषित कर गया
और तुम भी बेचैन तो होगे ही
मुझे मालूम हैं अब-तब
किसी न किसी बहाने मुझे याद कर रहे होगे
तब मुझे हिचकियाँ नहीं आयी बस
निश्चेत सी मेरी देह
रोम-रोम बसे तुम्हारे प्यार से
सराबोर हो रही थी…….!
सच तुम्हारी प्रीत एक दिव्य अनुभूति है…
जो कल भी अकूती थी आज भी अकूती है
जिस्मानी ज़रूरतों से अछूती है !
प्रियतम
यही है सच्चे प्रेम का अनुभव
चलो एक बार फिर हम कुछ दूरियां बनाएं
प्रेम में सच्चाई की लों जगाएं …
वही लों दुनिया के सामने ला देगी
“हमारी -तुम्हारी -सच्ची-प्रीत कथा ”
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जबलपुर ब्रिगेड
मुकुल’स ब्लॉग,
इश्क-प्रीत-लव
मिसफिट
बावरे-फकीरा
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आज तुमसे न मिल पाना
November 17th, 2009 by MUKUL
::एक अफसर का साहित्यिक आयोजन में आना ::
November 16th, 2009 by MUKUL
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पिछले कई दिनों से मेरी समझ में आ रहा है और मैं देख भी रहा हूँ एक अफसर नुमा साहित्यकार श्री रमेश जी को तो जहां भी बुलाया जाता पद के साथ बुलाया जाता है ….. अगर उनको रमेश कुमार को केवल साहित्यकार के रूप में बुलाया जाता है तो वे अपना पद साथ में ज़रूर ले जाते हैं जो सांकेतिक होता है। यानी साथ में एक चपरासी, साहब को सम्हालता हुआ एक बच्चे को रही उनकी मैडम को सम्हालने की बात साहब उन्हें तो पूरी सभा सम्हाले रहती है। एक तो आगे वाली सीट मिलती फ़िर व्यवस्था पांडे की हिदायत पर एक ऐसी महिला बतौर परिचर मिलती जिसे आयोजन स्थली का पूरा भौगौलिक ज्ञान हो ताकि कार्यक्रम के दौरान किसी भी प्रकार की शंका का निवारण सहजता से कराया जा सके। और कुछ लोग जो मैडम की कुरसी के उस सटीक एंगल वाली कुर्सी पर विराजमान होते हैं जहाँ से वे तो नख से शिख तक श्रीमती सुमिता रमेश कुमार की देख भाल करते हैं । उधर कार्यक्रम को पूरे यौवन पे आता देख रमेश जी पूरी तल्लीनता से कार्यक्रम में शामिल रहतें हैं साहित्यिक कार्यक्रम उनके लिए तब तक आकर्षक होता है जब तक शहर के लीडिंग अखबार और केबल टी वी वाले भाई लोग कवरेज़ न कर लें । कवरेज़ निपटते ही रमेश कुमार जी के दिव्य चक्षु ओपन हो जातें हैं और वे अपनी सरकारी मज़बूरी का हवाला देते हुए जनता से विदा लेते हैं । रमेश कुमार जैसे लोगों को इस समाज में साहित्य समागम के प्रमुख बना कर व्यवस्था पांडे जन अपना रिश्ता कायम कर लेतें हैं साहित्य की इस सच्ची सेवा से मित्रों मन अभीभूत है ……………..शायद आप भी ……….!!
बस यही है प्रेम तपस्या तापसी
November 16th, 2009 by MUKUL
बस यही है प्रेम तपस्या तापसी
शापित यक्ष
October 18th, 2009 by MUKUL
सूची में जो नाम नहीं थे वो लंगड़,दीनू,मुन्ना,कल्लू,बिसराम और नौखे के…?
love-invitation प्रीत निमंत्रण ..!
October 10th, 2009 by MUKUL
भेजा मुझ तक प्रीत निमंत्रण ..!
” जय हो युगरत्ना बधाई हो लखनऊ ”
September 24th, 2009 by MUKUL
संयुक्त राष्ट्र संघ में युग रत्ना श्रीवास्तव का वक्तव्य -” हम बच्चों की भी बाते अपने फैसलों में शामिल करें….!” एक गंभीर वक्तव्य है ।युग रत्ना की इस बात की पुष्टि में यहां यह कहना ज़रूरी हो गया है कि जितनी नि:स्वार्थ एवं सार्वभौमिक सकारात्मक सोच बच्चों की होती है कदाचित किसी बड़ी उम्र वाले की नहीं । विश्व यह जानता है कि भारतीय संस्कृति और उसके {भारत के } इतिवृत में “बालक-कृष्ण” की क्या भूमिका रही है । युग रत्ना के इस वक्तव्य का सीधा सपाट संकेत सरकारों और राजनेताओं के लिए यह है कि उस भविष्य के अहम् फैसलों में बच्चों और युवाओं की सोच को तरजीह देना ज़रूरी है…..सच है कि इनको आने वाले समय की बाग़ डोर अपने हाथों में कल जब मिलेगी तब ये नि:शब्द - निराशाओं से घिरे न हों ! आज विश्व के सभी देश फौरी ज़रूरतों और आसन्न राजनैतिक लाभों की प्राप्ति के लिए जो भी कुछ कर रहें हैं उससे यह पीढ़ी पूर्णत: सहमत कतई नज़र आती है।
अस्तु स्वामी विवेकानंद की अंतर्राष्ट्रीय-भाषण देने की उम्र से 10 वर्ष कम उम्र संयुक्त राष्ट्र संघ में दिया युग रत्ना श्रीवास्तव का भाषण भी विश्व को नई दिशा देगा यह तयशुदा बात है.
छोटी उम्र में युगरत्ना की बड़ी बातें
{ रेडियो डायचे वेले की वेब साईट
से साभार }
मांगो तो दिल और जाँ सब कुछ तुमको दे दूंगीं
August 16th, 2009 by MUKUL
वो दूर से देख मुस्कुराती शोख चंचल नयनो वाली सुकन्या मुझे भा गई ऊपर की जितनी भी तारिकाएँ हैं उनका हुस्न फीका पड़ गया उसके सामने।
मैंने पूछा - मुझे ,कुछ देर का वक्त मिलेगा
क्यों नहीं ! ज़रूर मिलेगा ।
बातों ही बातों में मैंने कहा: तुम मुझे कुछ देने का वादा कर सकोगी ?
वादा क्या दे दूंगीं जो कहोगे
दिल,
हां ज़रूर
मोहब्बत
ऑफ़ कोर्स
वफ़ा
क्यों नहीं ?
और कभी जब मुझे वक्त की ज़रूरत हो तो
ज़नाब ये सब कुछ अभी के अभी या फ़िर कभी ?
सोच के बताता हूँ कुछ दिन बाद कह दूंगा ।
-

आग उधर भी तेज़ है इश्क की जैसी इधर धधक
रही है । शाम को पापा,माँ,दीदी अपनी होने वाली बहू का इंतज़ार कर रहे थे। मेरे मन में भी चाकलेट के रूमानी विज्ञापन वाले प्यार का जायका ज़ोर मार रहा था। एक खूबसूरत नाज़नीन का घर में आना मेरे लिए दिल,मोहब्बत, वफ़ा और वक्त साथ लाना मेरी उपलब्धि थी ।
सभी सभी उससे बारी बारी बात कर रहे थे अन्त में मुझे मौका मिला . मैने पूछा “वो सब जो मैने कहा था ”
“हां लाई हूं न”
सुनहरी पर्स खोल कर उसने मेरे हाथों रख दीं - दिल,मोहब्बत,वफ़ा और वक्त की सीडीयां और पूछने लगी : पुरानी फ़िल्मों के शौकीन लगतें हैं आप . ?
“हां”
अब मुझे फ़िल्म ज़हर और ज़ख्म की सी डी ज़रूर ला देना .
ज़रूर ला दूंगी…. पर एक हफ़्ते बाद कल मेरी एन्गेज़्मेंट है. एन्गेज़्मेंट के बाद हम दौनो हफ़्ते भर साथ रहेंगे एक दूसरे को समझ तो लें .
जबलपुर रत्न एक नई परंपरा
August 14th, 2009 by MUKUL

विश्वास की परंपरा को कायम रखने का संकल्प लिए नई दुनिया”>नई दुनिया
ने जब रत्नों की तलाश शुरू की थी तो लगा था कि शायद व्यावसायिक प्रतिष्ठान द्वारा की गई कोई शुरुआत जैसी बात होगी ? किंतु जब जूरी ने रत्नों को जनमत के लिए सामने रखा तो लगा नहीं कुछ नया है जिसे सराहा जावेगा आगे चल कर , हुआ भी वही आज मैं जितने लोगों से मिला सबने कहा :”वाह ऐसी व्यक्ति-पूजा विहीन मूल्यांकन की परम्परा ही है विश्वास की परंपरा ओर सम्मानित हुए विशेष सम्मान शिक्षा क्षेत्र : एसपी कोष्टा उद्योग क्षेत्र : सिद्धार्थ पटेल चिकित्सा क्षेत्र : डॉ. सतीश पांडे न्याय क्षेत्र : अधिवक्ता आरएन सिंह पर्यावरण क्षेत्र : योगेश गनोरे
करीब पांच घंटे तक चले आयोजन के दौरान लोगों का मनोरंजन करने के लिए प्रख्यात बाँसुरी वादक बलजिंदर सिंह बल्लू, पॉलीडोर आर्केस्टा के कलाकारों सहित प्रियंका श्रीवास्तव, प्रसन्न श्रीवास्तव, श्रेया तिवारी ने शानदार रचनाएं पेश कर लोगों को मुग्ध कर दिया।बलजिंदर सिंह ने जब बांसुरी से “तू ही रे” और “पंख होते तो उ़ड़ जाती रे” की तान छे़ड़ी तो मेरे मन को किसी भी तरह की बाहरी हलचल बर्दाश्त नहीं हो रही उद्योगमंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने साबित कर दिया कि वे वास्तव में एक स्थापित कलाकार हैं । मंत्रीजी ने देशभक्ति गीत “कर चले हम फिदा जानो तन साथियों” “छोटी-छोटी गैया, छोटे-छोटे ग्वाल” पेश किया। प्रियंका के गीत “बलमा खुली हवा में” से लोग सावन के भीने अहसास में खो गए। जबकि प्रसन्न श्रीवास्तव ने “मेरे महबूब कयामत होगी” सुनाकर लोगों को किशोर कुमार की याद ताजा करा दी।
संस्कारधानी के सपूत व न्यायविदों की वर्तमान पी़ढ़ी के लिए ऋषितुल्य न्यायमूर्ति जीपी सिंह को पहला “जबलपुर रत्न” सम्मान आज़ सबसे ज़्यादा चर्चा का विषय रहा नई दुनिया ने इन विभूति का सम्मान कर विश्वास की परम्परा को कायम रखा।
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तरंग प्रेक्षागृह में गुरुवार शाम एक गरिमामय समारोह में जबलपुर रत्न सहित साहित्य-कला, शिक्षा, चिकित्सा, न्याय, समाजसेवा, पर्यावरण, उद्योग, खेल क्षेत्रों की नौ हस्तियों को रत्न सम्मान दिया गया जिनमें । समारोह की अध्यक्षता मप्र उच्च न्यायालय के प्रशासनिक न्यायाधीश जस्टिस आरएस गर्ग ने की, मुख्य अतिथि निर्माता-निर्देशक सुभाष घई थे। इस मौके पर बतौर अतिथि संगीतकार आदेश श्रीवास्तव और निर्देशक विवेक शर्मा के अलावा नईदुनिया समूह के प्रधान संपादक पद्मश्री आलोक मेहता भी विशेष रूप से उपस्थित थे। रूपरेखा की विस्तृत जानकारी स्थानीय संपादक आनंद पांडे ने दी। कार्यक्रम को संगीतकार आदेश श्रीवास्तव और निर्देशक विवेक शर्मा ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम का संचालन प्रदीप दुबे व सुरेंद्र दुबे “(सव्यसाची अलंकरण से अलंकृत) “ने किया। अंत में आभार प्रदर्शन महाप्रबंधक मनीष मिश्रा ने किया।
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सुभाष घई ने कहा : “बच्चों के मामले सही सोच की ज़रूरत है उनकी प्रतिभा को पहचानिये /आजाद भारत में अंग्रेजियत की सेवा पर टिप्पणी करते हुए सुभाष घई ने कहा गुलामी के दौर में हमने उनकी सेवा की आज पश्चिमी संस्कृति की नक़ल कर उनकी सेवा कर रहें हैं “/अपार संभावनाएं है रजत पट पर प्रतिभाओं की मया नगरी को हमेशा ज़रूरत थी , है और रहेगी ।
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आलेख : गिरीश बिल्लोरे मुकुल / सहयोग श्रीमती सुलभा बिल्लोरे /राजेश दुबे “डूबे जी” एवं शैली खत्री
आ मीत लौट चलें गीत को सवाँर ले अर्चना का वक़्त है आ बातियाँ सुधार लें
May 2nd, 2009 by MUKUL
आ मीत लौट चलें गीत को सवाँर ले
अर्चना का वक़्त है आ बातियाँ सुधार लें
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भूल हो गयी अगर गीत में या छंद में
जुट जाएं मीत आ सुधार के प्रबंध में
कोई रूठा हो अगर तो प्रेम से पुकार लें
आ मीत ……………………………!!
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कौन जाने कुंठित मन कितने घर जलाएगा
कौन जाने मन का दंभ- “कितने गुल खिलाएगा..?”
प्रेमकलश रीता तो, चल कहीं उधार लें ..!!
आ मीत ……………………………!!
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आत्म-मुग्धता का दौर,शिखर के वास्ते ये दौड़
न कहीं सुकून है,न मिला किसी को ठौर
शंख फ़िर कभी मीत आ हाथ में सितार लें ॥!
आ मीत ……………………………!!
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दरकती भू तपती दोपहरियाँ और तड़पती देहों का मेला।
May 1st, 2009 by MUKUL
कुछ पर्यावरण प्रेमियों के,
प्रकृति को बचाने की कोशिशें,
जिनके हाथ लगती है-
एक तपती हुई दोपहरी
और तड़पती देहों का मेला।।
मौसम विभाग की सलाह
अनदेखे ऊसरी दस्तावेज़,
मुँह चिढ़ाते,
धूप में खेतिहर मजूर-
साधना के वादे निभाते।।
उन्हें भी हासिल है,
तपती दोपहरी,
और तड़पती देह का मेला।।
मेधा से बहुगुणा तक अनशनरत तपस्वी,
रियो-डि-जेनरियो के दस्तावेज़।
उगाने को तत्पर-
नई प्रकृति - नए अनुदेश।
मिलेगी-हमें-
दरकती भू
तपती दोपहरियाँ
और तड़पती देहों का मेला।















